सन 1912 की बात है।
मध्य भारत में एक जगह थी — देवगढ़ का जंगल।
यह जंगल बहुत पुराना माना जाता था।
लोग कहते थे कि वहाँ रात में अजीब आवाजें आती हैं।
देवगढ़ के पास एक गाँव था — रामपुरा।
गाँव में एक आदमी रहता था —
नाम था शंकरराव।
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| कभी-कभी जीवन का सबसे बड़ा उत्तर हमें तब मिलता है जब हम डर के बावजूद अंधेरे रास्ते पर चलने का साहस करते हैं। |
शंकरराव पढ़ा-लिखा था, शहर में काम करता था,
और गाँव वालों की बातों पर विश्वास नहीं करता था।
जब लोग कहते —
“जंगल में मत जाना… वहाँ कुछ है…”
वह हँसकर कहता —
“डर इंसान के मन में होता है… जंगल में नहीं…”
उसे साबित करना था कि
गाँव वाले बेकार डरते हैं।
सावन का महीना था।
शंकरराव गाँव आया हुआ था।
रात को चौपाल में फिर वही बात चली —
देवगढ़ का जंगल।
एक बूढ़ा बोला —
“रात में वहाँ पत्थर बोलते हैं…”
सब डर गए।
शंकरराव हँसा —
“कल मैं जाऊँगा…
अकेला…
और देखूँगा कौन बोलता है…”
गाँव वाले चुप हो गए।
शाम होते-होते वह जंगल की तरफ चल पड़ा।
आसमान में बादल थे।
हवा भारी थी।
जंगल के अंदर जाते ही
अजीब सन्नाटा था।
न पक्षी…
न जानवर…
बस हवा।
थोड़ी दूर जाकर उसे एक पुराना मंदिर दिखा।
टूटा हुआ…
आधा गिरा हुआ…
वह अंदर गया।
अचानक…
ठक…
ठक…
ठक…
जैसे कोई पत्थर पर मार रहा हो।
वह रुक गया।
फिर आवाज आई —
“क्यों आए हो…”
शंकरराव चौंक गया।
कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
उसने जोर से कहा —
“कौन है?”
आवाज आई —
“जिससे भाग रहे हो…”
अब उसे गुस्सा आ गया।
“मैं किसी से नहीं भागता!”
तभी मंदिर के अंदर से
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| जब इंसान अपने जीवन के सवालों से भागना छोड़ देता है, तभी उसे सही मार्ग दिखाने वाला गुरु मिल जाता है। |
एक बूढ़ा साधु बाहर आया।
सफेद दाढ़ी…
गहरी आँखें…
बोला —
“सच बोलो…
तुम किससे भाग रहे हो?”
शंकरराव हँसा —
“मैं?
मैं किसी से नहीं डरता…”
साधु ने कहा —
“तो रात यहीं रुक जाओ।”
जंगल अंधेरा…
हवा तेज…
मंदिर के अंदर
दोनों बैठे थे।
अचानक शंकरराव को बेचैनी होने लगी।
उसे याद आने लगा —
उसका गुस्सा…
उसकी जल्दी…
उसकी बेचैनी…
उसका अकेलापन…
वह चिल्लाया —
“ये सब क्यों याद आ रहा है!”
साधु बोला —
“क्योंकि यहाँ कोई आवाज नहीं है…
और जब बाहर आवाज नहीं होती…
तो अंदर की आवाज सुनाई देती है…”
शंकरराव चुप।
पहली बार चुप।
साधु बोला —
“लोग जंगल से नहीं डरते…
लोग अपने मन से डरते हैं…
शहर में शोर होता है…
काम होता है…
लोग होते हैं…
इसलिए इंसान खुद से बच जाता है।
लेकिन यहाँ…
तुम और तुम्हारा मन…
बस वही है।”
शंकरराव की आँखों में आँसू आ गए।
सुबह
जब वह गाँव लौटा
लोगों ने पूछा —
“जंगल में क्या था?”
वह बोला —
“कुछ नहीं…”
फिर थोड़ी देर बाद बोला —
“सब कुछ था…”
“डर…
सच…
और मैं खुद…”
उस दिन के बाद
वह कम बोलने लगा
लेकिन ज्यादा शांत रहने लगा।
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| मनुष्य को जीवन में सबसे कठिन लड़ाई किसी और से नहीं, बल्कि अपने ही डर और सच्चाई से लड़नी पड़ती है। |
🟠 सीख
इंसान अंधेरे से नहीं डरता
वह अपने अंदर के सच से डरता है।
और इसलिए
वह हमेशा भागता रहता है —
काम में
लोगों में
शोर में
लेकिन
जिस दिन इंसान खुद से मिल लेता है
उस दिन उसका डर खत्म हो जाता है।
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