कौवे का अहंकार

 

कहानी शुरू करने से पहले ज़रा कल्पना कीजिए—आप एक ऐसे घने जंगल में खड़े हैं, जहाँ चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़ हैं, पक्षियों की चहचहाहट गूँज रही है और बीचों-बीच एक छोटी-सी नदी शांत होकर बह रही है। इस जंगल में सभी जानवर मिल-जुलकर रहते थे, लेकिन उनमें से एक कौवा ऐसा भी था, जिसे अपनी समझदारी और उड़ान पर बहुत घमंड था। उसे लगता था कि उससे बेहतर और चालाक कोई नहीं। लेकिन एक दिन जंगल में ऐसा सूखा पड़ा, जिसने उसके इस अहंकार को हमेशा के लिए बदल दिया।


एक घना जंगल था। जंगल के बीचों-बीच एक छोटी-सी नदी बहती थी। उसके किनारे ऊँचे साल और बरगद के पेड़ थे। गर्मियों में भी उस जंगल में पानी की कमी नहीं होती थी। जानवर नदी पर आते, अपनी प्यास बुझाते और फिर जंगल में लौट जाते।


उसी जंगल के एक पुराने बरगद पर एक कौवा रहता था।


वह बाकी कौवों से थोड़ा अलग था।


उसे अपनी उड़ान पर बहुत घमंड था। वह अक्सर ऊँचे पेड़ की सबसे ऊपरी डाल पर बैठकर नीचे के पक्षियों को देखा करता और मन ही मन सोचता—


"इस जंगल में मुझसे समझदार और फुर्तीला पक्षी कोई नहीं।"


एक दिन उसने देखा कि एक बाज आसमान में बहुत ऊँचाई पर उड़ रहा है।

अहंकारी कौवा बरगद की ऊँची डाल पर बैठा है और नीचे छोटे पक्षियों को देख रहा है, जबकि दूर आसमान में बाज उड़ रहा है।
अपनी उड़ान पर घमंड करने वाला कौवा नहीं जानता था कि जल्द ही जंगल का सूखा उसके अहंकार की परीक्षा लेने वाला है।


बाज कभी पंख फैलाकर हवा के साथ बहता, तो कभी अचानक नीचे झपटता और फिर उतनी ही तेजी से ऊपर उठ जाता।


कौवे ने उसे काफी देर तक देखा।


फिर वह हँसते हुए बोला,


"इतनी ऊँचाई पर उड़ने से क्या होता है? असली उड़ान तो वही है जो मुश्किल समय में काम आए।"


पास बैठे दूसरे कौवे ने कहा,


"लेकिन बाज हमसे बहुत ऊँचा उड़ता है।"


कौवा तुरंत बोला,


"ऊँचा उड़ना कोई बड़ी बात नहीं। मुझे मौका मिले तो मैं उससे भी ऊपर उड़ सकता हूँ।"



बाज ने नीचे से कौवे की बात सुन ली, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया।


वह चुपचाप उड़ता रहा।


कुछ ही दिनों बाद जंगल का मौसम बदल गया।


बारिश नहीं हुई।


पहले नदी का पानी थोड़ा कम हुआ। फिर छोटी धाराएँ सूखने लगीं। घास पीली पड़ गई। पेड़ों की पत्तियाँ मुरझाने लगीं।


दिन बीतते गए।


और एक दिन वह छोटी नदी भी सूख गई।


जंगल में भयंकर सूखा पड़ गया।


अब पानी के लिए जानवरों को बहुत दूर जाना पड़ता था।


कौवा फिर भी अपने पुराने बरगद पर बैठा रहता।


उसे लगता था कि वह दूसरों से ज्यादा चालाक है और किसी न किसी तरह पानी ढूँढ ही लेगा।


एक सुबह वह पानी की तलाश में निकला।


बहुत दूर उड़ने के बाद उसे एक चट्टान के पास मिट्टी में थोड़ी नमी दिखाई दी।


वह नीचे उतरा।


वहाँ एक छोटा-सा गड्ढा था, जिसमें बारिश का बचा हुआ थोड़ा पानी जमा था।


कौवा खुश हो गया।


"देखा! मैंने पानी ढूँढ लिया।"


वह पानी पीने ही वाला था कि तभी उसे कुछ आवाजें सुनाई दीं।


जंगल के छोटे-छोटे पक्षी भी पानी की तलाश में वहाँ पहुँच रहे थे।


कौवा तुरंत उस गड्ढे के सामने बैठ गया।


"रुको! पहले मैं पानी पिऊँगा।"


एक चिड़िया बोली,


"भाई, पानी बहुत कम है। थोड़ा-थोड़ा सब पी लेते हैं।"


कौवा बोला,


"जिसने पानी ढूँढा है, पहले उसका हक है।"


चिड़िया चुप हो गई।


कौवे ने खूब पानी पिया और फिर उड़ गया।


अगले दिन वह फिर उसी जगह पहुँचा।


लेकिन इस बार गड्ढे में पानी और कम था।


जब जंगल में पानी की एक-एक बूंद कीमती हो गई, तब कौवे का अहंकार उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा था।

सूखे जंगल में पानी के छोटे गड्ढे के पास कौवा खड़ा है और प्यासे पक्षी व कमजोर हिरन पानी का इंतजार कर रहे हैं।
जब जंगल में पानी की एक-एक बूंद कीमती हो गई, तब कौवे का अहंकार उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा था।



वहाँ एक बूढ़ा हिरन खड़ा था। वह बहुत कमजोर हो चुका था।


कौवे ने उसे देखा और बोला,


"यहाँ पानी बहुत कम है। तुम कहीं और चले जाओ।"


हिरन ने थकी हुई आवाज में कहा,


"कहीं और पानी होता तो मैं यहाँ क्यों आता?"


कौवा कुछ पल रुका, लेकिन उसके अहंकार ने उसे रोक दिया।


वह पानी पीकर उड़ गया।


कुछ दूर जाते ही उसे आसमान में बाज दिखाई दिया।


बाज नीचे उतरकर एक सूखे पेड़ पर बैठ गया।


कौवा उसे देखकर बोला,


"तुम भी पानी ढूँढ रहे हो?"


बाज ने शांत स्वर में कहा,


"हाँ।"


कौवा हँस पड़ा।


"इतना ऊँचा उड़ते हो, फिर भी पानी नहीं ढूँढ पाए?"


बाज ने कहा,


"पानी ढूँढने के लिए सिर्फ ऊँचा उड़ना जरूरी नहीं होता। सही समय पर सही जगह देखना भी जरूरी है।"

कौवे को यह बात पसंद नहीं आई।


वह बोला,


"तुम मुझे सिखाओगे?"


बाज ने कोई उत्तर नहीं दिया।


वह फिर आसमान में उड़ गया।


दिन गुजरते गए।


सूखा बढ़ता गया।


पेड़ों की डालियाँ सूखने लगीं। जानवर जंगल छोड़कर दूसरी जगह जाने लगे।


कौवे का अपना गड्ढा भी आखिर सूख गया।


अब पहली बार उसे समझ आया कि केवल चालाकी से पानी नहीं मिलता।


वह कई घंटे उड़ता रहा।


लेकिन कहीं पानी नहीं था।


शाम होने लगी।


कौवा थककर एक ऊँचे पेड़ पर बैठ गया।


तभी उसने दूर आसमान में बाज को देखा।


बाज एक दिशा में लगातार उड़ रहा था।


कौवा उसके पीछे हो लिया।


कुछ दूर जाकर उसे नीचे हरे पेड़ों का एक छोटा-सा हिस्सा दिखाई दिया।


वह नीचे उतरा।


वहाँ चट्टानों के बीच पानी की एक पतली धारा बह रही थी।


बहुत कम पानी था, लेकिन पानी था।


कौवा खुशी से पानी की ओर बढ़ा।


तभी उसने देखा कि वहाँ पहले से कई पक्षी और छोटे जानवर पानी पी रहे थे।


और सबसे पीछे वही बूढ़ा हिरन खड़ा था, जिसे उसने कुछ दिन पहले अपने पानी से भगा दिया था।


कौवा शर्मिंदा होकर एक तरफ खड़ा हो गया।


बाज ने उसे देखा।


उसने कुछ नहीं कहा।


कौवे ने धीरे से पूछा,


"तुम्हें यह जगह कैसे मिली?"


बाज बोला,


"मैंने इसे ऊपर से देखा था। लेकिन यह जगह सिर्फ मेरी नहीं है।"


कौवा चुप रहा।


बाज ने आगे कहा,


"जंगल में पानी कम हो तो प्यास सबको लगती है। ऐसे समय में जो थोड़ा पानी बचा है, उसे बाँटना ही समझदारी है।"


कौवे ने सिर झुका लिया।


उसे अपना पुराना व्यवहार याद आने लगा।


उसे याद आया कि उसने छोटे पक्षियों को पानी नहीं पीने दिया था।


उसे बूढ़ा हिरन याद आया।


बाज के पास छोटी जलधारा में पक्षी और हिरन पानी पी रहे हैं, जबकि बदला हुआ कौवा सिर झुकाकर खड़ा है।
कौवे ने आखिर समझ लिया कि असली ऊँचाई दूसरों से ऊपर उड़ने में नहीं, बल्कि जरूरत के समय दूसरों के काम आने में है।



और उसे अपना वह घमंड भी याद आया—


"मैं सबसे समझदार हूँ।"


उस दिन कौवे ने पहली बार समझा कि अहंकार इंसान को दूसरों से नहीं, खुद से दूर करता है।


वह हिरन के पास गया।


"मुझे माफ कर दो। उस दिन मुझे तुम्हें पानी से नहीं भगाना चाहिए था।"


हिरन ने उसकी ओर देखा और बोला,


"गलती समझ में आ जाए तो उससे बड़ी बात और क्या है?"


उस दिन से कौवा बदल गया।



जब भी उसे कहीं थोड़ा पानी मिलता, वह अकेले नहीं पीता। वह दूसरे पक्षियों को बुलाता।


धीरे-धीरे जंगल के बाकी पक्षियों ने भी यही करना शुरू कर दिया।


कुछ दिनों बाद बादल आखिरकार जंगल के ऊपर आए।


पहली बूंद सूखी धरती पर गिरी।


और देखते ही देखते बारिश शुरू हो गई।


सूखी नदी में फिर पानी बहने लगा।


पेड़ों पर नई पत्तियाँ आने लगीं।


जंगल फिर से हरा हो गया।


कौवा उसी पुराने बरगद पर बैठा था।


ऊपर आसमान में बाज उड़ रहा था।


इस बार कौवा उसे देखकर यह नहीं सोच रहा था कि वह उससे ऊँचा उड़ सकता है।


वह बस मुस्कुराकर सोच रहा था—


"ऊँचाई से किसी की महानता साबित नहीं होती। असली ऊँचाई इस बात से पता चलती है कि हमारे पास कुछ हो और हम उसे दूसरों के साथ कितना बाँट सकते हैं।"


Moral


अहंकार हमें अपनी ताकत दिखाता है, लेकिन मुश्किल समय हमें हमारी असली औकात दिखाता है।


सच्ची समझदारी दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि जरूरत के समय दूसरों के काम आने में है।

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