आस्था और अंधविश्वास


"एक व्यक्ति दो रास्तों के बीच खड़ा है — एक रोशनी की ओर जाता हुआ और दूसरा धुंध और अंधेरे की ओर, जो आस्था और अंधविश्वास के बीच चुनाव का प्रतीक है।"
"ज़िंदगी में दो रास्ते होते हैं—एक सोच की रोशनी का, दूसरा अंधे भरोसे का। आप किस ओर बढ़ रहे हैं?"


 हम सबके जीवन में कुछ मान्यताएँ होती हैं।

कुछ विश्वास होते हैं जो हमें हिम्मत देते हैं, दिशा देते हैं, सहारा देते हैं।

लेकिन यही विश्वास कभी-कभी बिना जाने-बूझे अंधविश्वास में बदल जाते हैं।

क्योंकि हम सोचते नहीं…

हम पूछते नहीं…

हम समझने की कोशिश नहीं करते।


आस्था और अंधविश्वास के बीच की रेखा पतली है—इतनी पतली कि पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कब हम आध्यात्मिकता से आगे बढ़कर अंधे भरोसे की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं।


यहीं से असली यात्रा शुरू होती है—सवाल पूछने की, समझने की, देखने और जागने की।


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आस्था—


आस्था सुंदर होती है।

वो इंसान को थकावट में उम्मीद देती है, संकट में सहारा देती है।

लेकिन जब हम बिना समझे किसी बात को पकड़ लेते हैं,

जब हम उसे खुद अनुभव नहीं करते,

तब वही आस्था धीरे-धीरे अंधश्रद्धा बन जाती है।


और यह बदलाव चुपचाप होता है—बिना किसी शोर के।

हम खुद भी महसूस नहीं करते कि कब हमने अपनी आँखें साधारणता से बंद कर लीं।



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भीड़ की सोच—


हम में से बहुत से लोग किसी मान्यता को इसलिए मानते हैं क्योंकि "सब मानते हैं"।

लेकिन सब मानते हैं—इसका मतलब यह नहीं कि वह सच भी है।


हम एक ऐसी चीज़ पर आस्था रख लेते हैं जिसका हमारे पास कोई ज्ञान या तर्क नहीं होता।

हम सिर्फ इसलिए follow करते हैं क्योंकि हमारे आसपास का समाज follow कर रहा है।


यह वही जगह है जहाँ से विचारहीनता जन्म लेती है—

जहाँ परंपरा को सोच से ज्यादा महत्व मिल जाता है।



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अंधविश्वास में झूठ पनपते हैं — 


जब किसी belief के पीछे समझ नहीं होती, वहाँ झूठ खुद-ब-खुद पैदा हो जाते हैं।

ये झूठ हमें कभी डराकर पकड़ कर रखते हैं,

कभी लालच देकर,

कभी धमकी देकर।


और अजीब बात यह है कि हम उन झूठों को protect करते हैं—

जैसे वो हमारी identity हों।

सच कहाँ है, इसका हम पता नहीं लगाते—

लेकिन जो सुना है, उसे defend ज़रूर करते हैं।


"अंधेरे में एक हाथ जलती हुई मोमबत्ती पकड़े हुए है, पास में फैली किताबों पर रोशनी पड़ रही है—जो ज्ञान और जागरूकता की शक्ति दिखाती है।"
"जहाँ सवाल पूछना शुरू होता है, वहीं अंधेरा खत्म होने लगता है।"


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अंधविश्वास वहीं शुरू होता है जहाँ सवाल खत्म हो जाते हैं


सवाल पूछना बुद्धि की पहचान है।

जहाँ कहा जाए "बस मान लो" —

वहीं अंधकार शुरू हो जाता है।


हर बात को, हर परंपरा को, हर विश्वास को आँख बंद करके मान लेना—

वही अंधविश्वास का पहला कदम है।


जब हम अपने मन को बंद कर देते हैं,

तो किसी भी व्यक्ति या व्यवस्था के लिए हमारी सोच को manipulate करना आसान हो जाता है।



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सोच खुली रखो — 


अगर कोई चीज़ है तो क्यों है?

उसका मूल क्या है?

उसकी आवश्यकता क्या है?

तर्क क्या है?


ये सवाल सिर्फ समझने के लिए नहीं—

स्वतंत्र बनने के लिए ज़रूरी हैं।


आस्था कोई कैद नहीं है।

आस्था स्वतंत्रता है।

लेकिन अंधविश्वास हमारी सोच को जकड़ लेता है।


इसलिए जब भी किसी मान्यता को स्वीकार करो,

अपने दिमाग को खुला रखो।

जितना पूछोगे, जितना समझोगे—

उतना सच्चाई साफ़ दिखेगी।



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एक छोटी सी कहानी — 


एक पुराने गाँव में एक मंदिर था।

हर सुबह पूजा शुरू होने से पहले पंडित एक बिल्ली को कमरे में बंद कर देता था ताकि वह पूजा में बाधा न डाले।


लोगों ने कारण नहीं पूछा—बस देखने-देखने वही आदत बन गई।


सालों बीते।

पंडित मर गया।

बिल्ली भी मर गई।

लेकिन मंदिर में आने वाले लोग आज भी पूजा से पहले कमरे का दरवाज़ा बंद करते रहे—

जैसे कोई अदृश्य बिल्ली आज भी जीवित हो।


एक दिन एक छोटे बच्चे ने पूछा:


“जब बिल्ली ही नहीं है तो दरवाज़ा क्यों बंद कर रहे हो?”


"मंदिर के आँगन में सुबह का दृश्य, एक बच्चा बंद कमरे को जिज्ञासा से देख रहा है जबकि बाकी लोग बिना सोचे-समझे रूटीन follow कर रहे हैं।"
"जब आप ‘क्यों?’ पूछते हैं, तब ही असली समझ शुरू होती है।"



किसी को जवाब नहीं मिला।

क्योंकि किसी ने कभी सोचा ही नहीं था।


वो सिर्फ एक क्रिया बन चुकी थी—

आदत बन चुकी थी—

परंपरा बन चुकी थी—

जिसमें कोई अर्थ नहीं बचा था।

इस छोटी सी कहानी में अंधविश्वास का पूरा सच छिपा है।



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निष्कर्ष — 


आस्था इंसान को ऊपर उठाती है।

अंधविश्वास इंसान को नीचे गिराता है।

आस्था प्रकाश देती 

है।

अंधविश्वास अंधेरा फैलाता है।


आस्था रखना अच्छी बात है—

लेकिन आँखें खोलकर।

समझ के साथ।

सवालों के साथ।

यही असली आध्यात्मिकता है।


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