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| “जब नज़र सिर्फ़ लक्ष्य पर टिक जाती है, तो बाधाएँ खुद किनारे हो जाती हैं।” |
मेरे spiritual blog Awaken 0 Mind में आपका स्वागत है।**
आज हम एक ऐसे विषय पर बात करेंगे
जिसकी वजह से दुनिया भर के लोग उलझन, तनाव और डर में फँसे रहते हैं।
🤔 “क्या हो अगर…?”
क्या हो अगर हम अपनी आधी ऊर्जा सिर्फ इस सोच में बर्बाद कर रहे हों कि
“आगे क्या होगा?”
सच तो यही है, हम ऐसा ही करते हैं। जबकि हमारी पूरी शक्ति वहीं से शुरू होती है…
जहाँ हम खुद से पूछते हैं:
“मुझे सच में क्या चाहिए?”
📜 एक छोटी-सी कहानी — बुद्ध और गंदे पानी की।
एक बार भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ जंगल से गुजर रहे थे।
धूप तेज थी और उन्हें प्यास लगी।
उन्होंने एक शिष्य से कहा:
“वहाँ बहती उस नदी से थोड़ा पानी ले आओ।”
शिष्य गया…
लेकिन नदी से अभी-अभी बैलगाड़ी निकली थी।
कीचड़ घुल चुका था, पानी गंदा, धुँधला और पीने लायक बिल्कुल नहीं।
वह वापस आया और बोला:
“भंते, पानी साफ नहीं है। कैसे लाऊँ?”
बुद्ध मुस्कुराए और बोले:
कुछ देर बाद शिष्य फिर गया।
इस बार पानी थोड़ा शांत था, पर अभी भी साफ नहीं लग रहा था।
वह फिर लौट आया।
बुद्ध ने शांत भाव से कहा:
“फिर जाओ…”
इस बार शिष्य पहुँचा तो देखा—
पानी पूरी तरह साफ हो चुका था।
सारी मिट्टी नीचे बैठ गई थी।
वह पानी लेकर लौटा।
बुद्ध ने कहा:
“देखा? तुमने कुछ नहीं किया… बस थोड़ा इंतज़ार किया।”
🟣 शिष्य क्या भूल गया था?
लोग इस कहानी में अक्सर सिर्फ मन शांत रखने वाली सीख देखते हैं,
लेकिन एक और गहरी सीख छिपी है:
शिष्य बार-बार यही सोच रहा था कि ‘गंदा पानी कैसे ले जाऊँ?’
पर वह एक बात भूल गया — उसे चाहिए क्या था?
उसे चाहिए था पानी, perfection नहीं।
उसका पूरा ध्यान “क्या होगा” पर था:
“अगर मैंने गंदा पानी दे दिया तो?”
“अगर भंते नाराज़ हो गए तो?”
“अगर ये ठीक नहीं हुआ तो?”
वह भूल गया कि Buddha ने उससे सिर्फ पानी लाने को कहा था,
न कि तुरंत और बिलकुल साफ पानी लाने को।
अगर वह पहली बार में ही थोड़ा इंतज़ार कर लेता,
तो वही पानी अपने आप साफ हो जाता।
बस थोड़ी clarity चाहिए थी…
थोड़ा patience…
और ये समझ कि उसे वास्तव में चाहिए क्या।
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| “क्या होगा मत सोचो… बस ये सोचो कि तुम्हें क्या चाहिए।” |
🟣 एक छात्र का सच
मैंने एक छात्र को देखा था
जो हमेशा इसी डर में फँसा रहता था:
“अगर मैं पास नहीं हुआ तो?”
“अगर नंबर कम आ गए तो?”
“अगर सब मुझसे आगे निकल गए तो?”
वह पढ़ाई कर रहा था,
लेकिन आधा दिमाग किताब पर,
और आधा दिमाग डर में।
मैंने उससे पूछा:
“तुझे चाहिए क्या?”
वह रुक गया।
सोचा।
और बोला:
“मुझे अच्छे नंबर चाहिए… बस इतना।”
मैंने कहा:
“फिर उसी पर ध्यान दे।
Result की चिंता छोड़।
अपने ‘चाहने’ पर focus कर।”
वह पहली बार पढ़ाई को हल्के मन, clarity और confidence से करने लगा।
नतीजा?
वह सिर्फ पास नहीं हुआ…
बल्कि merit list में आया।
क्योंकि जब ध्यान “क्या होगा” से हटकर “मुझे क्या चाहिए” पर जाता है,
तो मन की सारी ऊर्जा एक दिशा में बहने लगती है —
और वही direction outcome बदल देती है।
🟣 निष्कर्ष —
अगर तुम्हारा मन हर वक्त ये सोचता रहा:
“क्या होगा? क्या गलत होगा? क्या बिगड़ सकता है?”
तो तुम problem की ओर चल पड़ोगे।
लेकिन अगर तुम खुद से पूछो:
“मुझे सच में क्या चाहिए?”
तो रास्ता अपने आप साफ होने लगता है—
उसी नदी के पानी की तरह।
डर मत सोचो।
समस्या मत सोचो।
Outcome मत सोचो।
बस इतना पूछो:
“मुझे चाहिए क्या?”
यकीन मानो, ब्रह्मांड उसी पर काम करेगा
जिस पर तुम्हारा ध्यान टिकेगा।



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